Saturday, April 30, 2016

आओ तुम्हें जज़्बात सुनाऊँ !

"आओ तुम्हें जज़्बात सुनाऊँ !"

बिखरी जुल्फें, होंठ शबनमी, और चांदनी रात सुनाऊँ,
या सूखे की मार झेलते लोगों के हालात सुनाऊँ ।

आओ तुम्हें जज़्बात सुनाऊँ !

नहीं लिखी जाती मुझसे वो प्रेम और मनुहार की बातें,
बिंदिया, चूड़ी, कंगन, झुमके, पायल की झनकार की बातें ।
जब पीने के जल की खातिर तरस रही आधी आबादी,
ऐसे में कैसे लिख दूं मैं, इश्क मुहब्बत प्यार की बातें ।
ठन्डे चूल्हे, उजड़ी बस्ती, भूखे बच्चे, रोती माँ,
और पिता की सूनी आँखों से होती बरसात सुनाऊँ !

आओ तुम्हें जज़्बात सुनाऊँ !

मैं फूहड़ चुटकले, और अश्लील व्यंग्य न लिख पाऊंगा,
मैं साकी, हाला, मधुशाला, के प्रसंग न लिख पाऊंगा ।
मुझे तो हरदम दर्द से उठती चीख सुनाई देती है,
पैरों के छाले, आँसू की रेख दिखाई देती है ।
जिनके घर की बहू-बेटियां टुकड़ों में बिक जाती हैं,
तुम्हें रोज़ उनके जीवन में होती शह और मात सुनाऊँ !

आओ तुम्हें जज़्बात सुनाऊँ !

कितने नेता और सरकारें, कितने वादे और विकास,
कितने बरस बीत गए फिर भी रोज़ जगाते झूठी आस ।
कोई कहता अच्छे दिन हैं, कोई कहता सबका साथ,
पर कोई भी बदल नहीं पाया अब तक इनके हालात ।
मगर मैं लिखता आया हूँ, आगे भी लिखता जाऊंगा,
पीड़ा होगी जब जब मुझको, तब तब मैं वो बात सुनाऊँ !

आओ तुम्हें जज़्बात सुनाऊँ !

Thursday, April 28, 2016

सुनो प्रिये नाराज न होना !

एक मध्यमवर्गीय पति अपनी पत्नी की शिकायतों और उलाहनों को दूर करने के लिए उसे कैसे समझाता है वो मैंने इस कविता के माध्यम से समझाने का प्रयास किया है !

सुनो प्रिये नाराज़ न होना,
अभी तो ऑफिस की जल्दी है,
कल हम दोनों बात करेंगे !

अगले माह जरूर चलेंगे
पिकनिक या फिर कहीं घूमने,
जहाँ बिताएंगे पल दो पल
एक दूजे के साथ अकेले,
आज तो बाइक भी खराब है,
बस से ऑफिस जाना होगा,
बच्चों को समझा देना तुम,
कैसे हम सब साथ चलेंगे,
इस पर भी कल बात करेंगे !

अभी तो ऑफिस की जल्दी है,
कल हम दोनों बात करेंगे !

राशन का सामान ख़तम है !
और महीने के छह दिन बाकी,
किसी तरह तुम काम चला लो,
कुछ पैसे बच जाएँ ताकि,
माँ-बापू की दवा है लानी,
और बच्चों की फीस चुकानी,
क्या-क्या और काम बाकी हैं,
यह भी कल हम याद करेंगे,
इस पर भी कल बात करेंगे !

अभी तो ऑफिस की जल्दी है,
कल हम दोनों बात करेंगे !

अभी वक़्त कुछ ठीक नहीं है,
पर यह दिन भी कट जाएंगे,
यही दिलासा दे लो मन को,
गम के बादल छँट जाएंगे,
अपना क्या है जैसे तैसे,
अपना जीवन बीत चला है,
बच्चों के भविष्य की दुनिया,
कैसे हम आबाद करेंगे ?
इस पर भी कल बात करेंगे !

अभी तो ऑफिस की जल्दी है,
कल हम दोनों बात करेंगे !

सुनो प्रिये नाराज़ न होना,
कल हम दोनों बात करेंगे !

अम्बेश तिवारी
28.04.2016

Wednesday, April 27, 2016

बचपन के दिन

मित्रों आज अपने बचपन को याद करते हुई एक छोटी सी कविता लिखने का प्रयास किया है । आप लोगों की प्रतिक्रिया का स्वागत है ----

अब भी आँखों में बसते हैं कुछ ख्वाब पुराने बचपन के,
वो भरी दुपहरी में क्रिकेट के मैच पुराने बचपन के ।।
आ बैठ साइकिल पर फिर दोनों चलते हैं उन गलियों में,
वो चाट, समोसे, दही जलेबी, छोले खाने बचपन के ।।
है याद पड़ोसन वो जिसको हम छत से ताका करते थे,
किस्से कितने पीछे छूटे सब इश्क पुराने बचपन के ।।
वो नयी मोपेड पर बैठ सिनेमा देखने जाना छुप छुप कर,
और पकड़े जाने पर देना फिर वही बहाने बचपन के ।।
वो रात-रात भर बैठ के पढ़ना, करना साथ ठिठोली भी,
वो शेर शायरी और कविता वो शौक पुराने बचपन के ।।
वो होली के हुड़दंग कहाँ, वो कहाँ दीवाली की रौनक,
वो वक़्त गया, सब छूट गया, अब गए ज़माने बचपन के ।।
तेरा बिज़नस, नौकरी मेरी, बस यही बचा है जीवन में,
अब कहाँ बचे वो खेल, कहाँ वो दोस्त पुराने बचपन के ।।

----अम्बेश तिवारी
27.04.2016

Monday, April 25, 2016

खूब मज़े में !

ओहदा छोटा, बड़ी कमाई, खूब मजे में !
नगर निगम में लग गया भाई, खूब मजे में !
उसका अफसर उससे खुब खुश रहता है,
चोर चोर मौसेरे भाई, खूब मजे में !
जनता तो बस छाछ पिये, वो भी खट्टा
नेता पी गए दूध मलाई, खूब मजे में !
साहब से ज्यादा तो उसकी चलती है,
है उनकी जोरू का भाई, खूब मजे में !
जबसे चमचागीरी करना सीख लिया,
निकल पड़ी अपनी भी भाई, खूब मजे में !
नेता हो तो पासवान सा दूरंदेशी,
हरदम जिसने कुर्सी पाई खूब मजे में !
टिकट मिले बन जाओ विधायक फिर क्या कहना,
रहो सपाई या बसपाई खूब मज़े में !
नाम के आगे लिख लो यादव फिर यूपी में,
मिले नौकरी, मिले लुगाई, खूब मजे में !
आने वाला है चुनाव होगा गठबंधन,
भूल के सारी हाथापाई खूब मजे में !
ओहदा छोटा बड़ी कमाई खूब मजे में,
नगर निगम में लग गया भाई खूब मजे में !

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अम्बेश तिवारी
रचनाकाल - 25.04.2016

मेरे बचपन के राजा मेरे पिता !


अभी कुछ दिनों पहले मेरे पिता की एक सर्जरी हुई थी| अस्पताल से घर आने के बाद कल उनसे बात करते हुए पहली बार मुझे यह आभास हुआ कि शायद बीमारी और कमजोरी के कारण वो काफी थका हुआ महसूस कर रहे थे| या फिर आयु अब धीरे धीरे उन पर अपना असर दिखा रही है| एक पुत्र के लिए यह बेहद अजीब और असहज अनुभूति होती है जब उसके पिता जो हमेशा उसके लिए उर्जा का श्रोत रहे हो स्वयं को उर्जाविहीन और थका हुआ महसूस करें | यह कविता मेरे पिता और उनकी आयु के सभी पिताओं को समर्पित है –

जिस बरगद की छाँव में बचपन,खुद का बढ़ते देखा मैंने,

उस बरगद के  ऊपर अब एक, उम्र को चढ़ते देखा मैंने,

पके पकाए आम हैं खाए, अब तक जिसकी मेहनत के ,

कल उससे सूखे मुरझाये,पत्ते झड़ते देखा मैंने,

मैं जिनसे रोशन हूँ, जिनमें मैं सपनों सा रहता हूँ, 

चाँद सी उन आँखों के नीचे, धब्बे पढ़ते देखा मैंने,

जो हाथों पर थाम मुझे, आकाश झुलाया करते थे,

कल उनको डगमग क़दमों से झुक कर चलते देखा मैंने,

रात  रात  भर  जाग  के  मेरी, पहरेदारी  करने  वाली , 

बोझिल थकती आँखों को अब, नींद में जगते देखा मैंने,

ताज नहीं कोई, राज नहीं पर,  फिर भी राजा लगते थे,

बचपन के उस राजा को कल, बाप में ढलते देखा मैंने,

जिस बरगद की छाँव में बचपन,खुद का बढ़ते देखा मैंने,

उस बरगद के  ऊपर अब एक, उम्र को चढ़ते देखा मैंने|