Wednesday, May 18, 2016

मत लेना तुम मेरा नाम !

मत लेना तुम मेरा नाम !

तुम्हें सैकड़ों काम पड़े हैं, तुम अतिव्यस्त जगत के प्राणी !
कैसे तुम्हें सुनाऊँ अपने, अंतर्मन की करूण कहानी !
मेरा जीवन काँटों जैसा, तुम फ़ूलों से ज्यादा कोमल,
तुम जैसे निर्मल गंगा हो, मैं बारिश का बहता पानी,
अपना जगमग शहर संभालो, छोड़ो मेरा उजड़ा ग्राम !

मत लेना तुम मेरा नाम !

बड़े बड़े हैं ख़्वाब तुम्हारे, और बड़ा सा एक संसार ;
मेरे सपने लाश हो गए, जिन्हें न मिलते कन्धे चार ।
तुम्हें सुलभ हैं सब सुख साधन, मैं श्रमजीवी कृषक समान,
तुम जैसे अतिशीघ्र सफलता, मैं जैसे बिकता व्यापार !
मैं क्या हूँ अब तुम मत सोचो, तुमको मुझसे अब क्या काम !
मत लेना तुम मेरा नाम !

:::::अम्बेश तिवारी
18.05.2016

Monday, May 16, 2016

तुम नेता बन जाओ !

बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !
खूब मिलेगा नाम के तुम नेता बन जाओ !

शहर में पूरा रौब तुम्हारा छा जाएगा, 
हर अफसर चपरासी तुमसे घबराएगा ।
पाँचो ऊँगली घी में होंगी, सिर कढ़ाही में, 
जीत तुम्हारी ही होगी हर इक लड़ाई में ।
उतने ही मशहूर बनोगे, धाक जमेगी, 
जितने हो बदनाम कि तुम नेता बन जाओ !
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !

अपनी एक छोटी सी सेना जल्द बनाओ, 
औरों को भी रोज़गार उसमे दिलवाओ ।
कुछ बकैत लड़के, कुछ पहलवान जैसे हों, 
इनको दारू मुर्गा तुम हर रोज़ खिलाओ,
किसी बड़े नेता से मिलकर सेटिंग कर लो, 
आओ उनके काम के तुम नेता बन जाओ !
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !

चंदे का व्यापार, जुआँ सट्टा चलवाओ, 
बिना बात के रोज़ कहीं कट्टा चलवाओ,
लोकल थाना पुलिस प्रशासन से मिलजुल कर, 
दो नंबर का दारू का अड्डा चलवाओ !
जो कोई भी आये रास्ते में तुम उसका, 
कर दो काम तमाम कि तुम नेता बन जाओ !
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !

हर ऊँगली में रहे अंगूठी, कमर में पिस्टल, 
गाड़ी में रखी हों दो व्हिस्की की बोटल,
चेले हों दो चार तुम्हारे दायें बाएं ! 
बियर बार में जाकर खूब मचाओ हलचल,
सुरा-सुन्दरी पर जमकर रुपया बरसाओ, 
अय्याशी हर शाम कि तुम नेता बन जाओ ।
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !

रुपया लेने में तुम मोल भाव न करना, 
हिन्दू मुस्लिम में भी भेदभाव न करना,
चाहे कोई हो गरीब, निर्धन, असहाय, 
कोई तुम्हारी गिद्ध दृष्टि से बच न पाये ।
धंधे में तुम कभी न करना कोई मुरव्वत, 
लेना सबसे दाम के तुम नेता बन जाओ |
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !

जब चुनाव हो शहर में तुम दंगा करवाओ, 
लोकतंत्र को सरेआम नंगा करवाओ,
विरोधियों की हत्या होती है होने दो, 
अपना सारा खेल भला चंगा करवाओ ।
टिकट मिले बन जाओ विधायक किसी तरह से, 
तब करना आराम के तुम नेता बन जाओ !
बड़ा सरल यह काम के तुम नेता बन जाओ !
खूब मिलेगा नाम के तुम नेता बन जाओ !


::::::अम्बेश तिवारी 

Saturday, May 14, 2016

मैं गीत यही दोहराता हूँ !!

मैं गीत यही दोहराता हूँ !

जीवन की करुण वेदना से,
जब कुंठित मन हो जाता हूँ ;
तब गीत यही दोहराता हूँ !
मैं गीत यही दोहराता हूँ !

दिनकर की स्वर्ण रश्मियां जब,
पट खोल धरा पर नृत्य करें,
या सघन मेघ उनके पथ पर,
आकर उनको अवरूद्ध करें !
हो ग्रीष्म काल की शुष्क पवन,
या शीतल शिशिर समीर बहे ;
पर कर्मशील मानव-जीवन,
अपनी गति से गतिमान रहे !
इस जीवन-गति दावानल में,
जल कर मैं भस्म हो जाता हूँ,
कुछ और न तब कह पाता हूँ,
मैं गीत यही दोहराता हूँ !

यह बंधु-बांधव, लौकिक जन,
धन-धान्य, सम्पदा, आभूषण,
घेरे मुझको ऐसे जैसे,
कोई विषधर फैलाये फन,
कुछ प्रेमी जन हैं पर वो भी,
निज स्वार्थ विवश, निज कर्म मगन,
मेरे अंतर की पीड़ा पर,
रोता मेरा ही अंतर्मन ;
जब अपने मन की बातों को,
अपनों से नहीं कह पाता हूँ
तब गीत यही दोहराता हूँ !
मैं गीत यही दोहराता हूँ !

मेरी पीड़ा इतनी सी बस,
कोई जग में पीड़ित न हो,
कोई निर्धन लाचार दुखी,
कोई अस्वस्थ, व्यथित न हो,
न धन के लिए कहीं कोई,
भ्राता-भ्राता में हो विवाद,
कोई अधर्म पाखण्ड कपट,
छल, माया बीच भ्रमित न हो ;
इन इच्छाओं को इस युग में,
मृतप्रायः सदा ही पाता हूँ,
कुछ और न तब कह पाता हूँ ;
मैं गीत यही दोहराता हूँ !!

अम्बेश तिवारी
::14.05.2016

Thursday, May 12, 2016

इस किताब का पन्ना पन्ना तेरा है !

शब्दों का यह बहता दरिया तेरा है,
मैं जो भी लिखता हूँ चर्चा तेरा है !

मौसम की यह धूप सुनहरी, सर्द हवाएं,
और बसंती ऋतु का पहरा तेरा है !

जो भी ख्वाब खुदा ने मुझको बख्शे हैं,
उन ख्वाबों का कतरा कतरा तेरा है !

जितनी उम्र कटी तेरे बिन ख़ाक हुई,
अब जीवन का लम्हा लम्हा तेरा है !

तुझको छोड़ के जाऊं भी तो जाऊं कहाँ,
मेरा सब सुख चैन, बसेरा तेरा है !

जब अपना सर्वस्व तुम्हीं को सौंप दिया,
तब जो कुछ मेरा है, वो सब तेरा है !

इक-इक कविता, गीत, ग़ज़ल में तुम शामिल हो
इस किताब का पन्ना, पन्ना तेरा है !

:::::अम्बेश तिवारी
12.05.2016

Tuesday, May 10, 2016

उसकी नज़रों में खो गईं नज़रें !

उसकी नज़रों में खो गईं नज़रें,
तब से बदनाम हो गईं नज़रें !
उसके ख़त को पढूं भी तो कैसे,
पूरा कागज़ भिगो गईं नज़रें ।

मयकदा ढूंढता फिरूँ वाइज़,
इतनी फुर्सत कहाँ मुझे अब है,
उसकी आँखों में मय के प्याले थे,
बस उसी में डुबो गईं नज़रे !

मुहँ से इक लफ्ज़ भी नहीं निकला,
वो मेरा हाले दिल समझ भी गए,
आँखों आँखों ने गुफ्तगू कर ली,
दिल का आइना हो गईं नज़रें !

ये मोहब्बत भी एक तमाशा है,
जिसमे फ़ुर्क़त भी है, तन्हाई भी,
बस तेरे लौटने की राहों पर,
कितनी वीरान हो गईं नज़रें !

अम्बेश तिवारी
10.05.2016

है एक सांस का लफड़ा !

इस ग़ज़ल का मतला मेरे मित्र श्री आशीष शुक्ला जी ने कहा था और यूँ ही हम दोनों ने मिलकर एक एक शेर कहते हुए एक साझा कोशिश के तहत ग़ज़ल मुकम्मल कर दी ---

है एक साँस का लफड़ा, लिया लिया न लिया,
मरीज-ऐ-इश्क़ का क्या है, जिया जिया न जिया!
जब उनकी आँखें ही हैं मयकदे से बढ़कर यूँ,
असल में जाम फिर हमने पिया पिया न पिया !
नमाज़े इश्क तो ख्वाबों में भी हो जाती है,
फिर उसके वास्ते वज़ू किया, किया न किया !
बदन ही आज तार-तार हुआ है मेरा,
फिर कोई चाक गरेबाँ, सिया सिया न सिया !
मेरी ख़ुशी की उसे जब नहीं कोई परवाह,
हिसाब अपने ग़मों का दिया, दिया, न दिया !
खैर हम प्यासे ही रह जाते हैं मयखाने से,
जहर जुनूं का है काफी, पिया पिया न पिया !
है यह अम्बेश और आशीष की साझा कोशिश,
के इस ग़ज़ल को मुकम्मल किया, किया न किया !!

अम्बेश तिवारी एवं आशीष शुक्ला
रचना-10.05.2016

Monday, May 9, 2016

मेरी बेटियां !

अपनी कोमल मुस्कानों से सब चिंता बिसरा देती हैं,
मेरी दो नन्हीं कलियाँ घर आँगन को महका देती हैं ।।
जब अपने नन्हें हाथो से मेरे बालों को सहलाती,
वो मेरी बेटियाँ मुझे माँ का एहसास दिला देती है ।।
छुपन-छुपाई, अक्कड़-बक्कड़, पोसम्पा और चिड़िया उड़,
खेल खेल के साथ मेरे, मेरा बचपन लौटा देती हैं ।।
लौट के जब घर आता हूँ तब दौड़ के मेरे सीने से,
लिपट के अपने सारे दिन का किस्सा वो बतला देती हैं ।।
तितली सी उड़ती फिरती हैं, मेरी जीवन बगिया में,
एक दिन सचमुच उड़ जाएँगी यह भी याद दिला देती हैं ।।
मुझ जैसे फक्कड़, आवारा, को भी अपने होने से,
पिता की पदवी पर बैठाकर जिम्मेदार बना देती हैं ।।
अपनी कोमल मुस्कानों से सब चिंता बिसरा देती हैं,
मेरी दो नन्हीं कलियाँ घर आँगन को महका देती हैं ।।

::अम्बेश तिवारी
09.05.2016

Saturday, May 7, 2016

रोज़ टूटते रोज़ बिखरते फिर भी आँखों में बसते है !

रोज़ टूटते रोज़ बिखरते फिर भी आँखों में बसते है ।
हम जैसे लोगों के स्वप्न-महल देखो कितने सस्ते हैं ।।
जिसने धन-दौलत के चलते सारे रिश्ते तोड़ लिए ।
अम्मा-बापू अब भी उसके लिए रोज़ पूजा करते हैं ।।
जिनको साथ लिए बरसों तक ढोया मेरे पुरखों ने ।
मेरी दो रोटी की खातिर वो उसूल हर दिन मरते हैं ।।
उसकी लाचारी उसकी खुद्दारी पर भारी पड़ती है ।
यूँ ही नहीं किसी औरत की इज्जत के सौदे लगते हैं ।।
उन्हें फ़िक्र है मन्दिर, मस्जिद, हिन्दू और मुसलमाँ की ।
उनकी इसी सियासत पर कितने बेबस सूली चढ़ते हैं ।।
जिन रिश्तों के लिए आदमी जीवन भर मरता रहता है ।
वो ही रिश्ते उसके मरते ही उसको मिट्टी कहते हैं ।।

::::अम्बेश तिवारी
रचना : 07.05.2016