Tuesday, August 30, 2016

यह दिल के राज़ इशारों में बताया करिये !

खुली आँखों को कोई ख्वाब दिखाया करिये,
कभी आँधी में चरागों को जलाया करिये ।
यूँ सरेआम मोहब्बत की न बातें करिये,
यह दिल के राज़ इशारों में बताया करिये ।
फ़ुर्क़त-ए-इश्क़ में रोना सभी को आता है,
किसी की बेबसी पे अश्क बहाया करिये ।
सिर्फ मस्जिद में इबादत नहीं हुआ करती,
कभी गरीब की बस्ती में भी जाया करिये ।
खिलखिलाने से हुस्न पर निखार आता है,
देख कर हाल मेरा खुद को हँसाया करिये ।
वो न मन्दिर में रहेगा न किसी मस्जिद में,
ख़ुदा को अपनी ज़ेहनियत में बसाया करिये ।
बहुत उम्दा न सही, हम भी ग़ज़ल कहते हैं,
कभी महफ़िल में हमें भी तो बुलाया करिये ।

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अम्बेश तिवारी

Sunday, August 21, 2016

हवा के संग संग गीत सुनाना अच्छा लगता है !

हवा के संग संग गीत सुनाना अच्छा लगता है,
तारे गिन गिन रात बिताना अच्छा लगता है ।
वो बोलीं इस बारिश में एक रेनकोट ले लो,
हम बोले हमें भीग के आना अच्छा लगता है !

कोई भुला न पाया अपने बचपन वाले खेल,
कंचे, लूडो, गुल्ली डंडा, पटरी वाली रेल,
क्लास के बाहर मुर्गा बनना, रोज़ मार खाना,
नकल मार कर पेपर लिखना या हो जाना फेल ।
बारिश में भी पतंग उड़ाना अच्छा लगता है,
उनसे नज़र के पेंच लड़ाना अच्छा लगता है ।
हवा के संग संग गीत सुनाना अच्छा लगता है,
तारे गिन गिन रात बिताना अच्छा लगता है ।

मोती झील की सैर सुहानी, माल रोड की चाट,
अब भी याद आती है उनसे पहली मुलाक़ात ।
छुप छुप मिलना, बातें करना लव लैटर देना,
वो रीगल में फ़िल्म देखना, DDLJ साथ,
हमको अब तक वही ज़माना अच्छा लगता है,
उनकी गली में आना जाना अच्छा लगता है ।
हवा के संग संग गीत सुनाना अच्छा लगता है,
तारे गिन गिन रात बिताना अच्छा लगता है ।

जब से शादी हुई रात दिन बन गए कोल्हू बैल,
याद रह गया सब्जी, भाजी, राशन, नून और तेल,
महंगाई में आटा गीला, पतली हो गयी दाल,
पत्नी से प्रतिदिन का झगड़ा, जैसे कोई खेल ।
बिना बात के बहस लड़ाना अच्छा लगता है,
जब वो रूठे उन्हें मनाना अच्छा लगता है ।
हवा के संग संग गीत सुनाना अच्छा लगता है,
तारे गिन गिन रात बिताना अच्छा लगता है ।
वो बोलीं इस बारिश में एक रेनकोट ले लो
हम बोले हमें भीग के आना अच्छा लगता है !

:::::अम्बेश तिवारी "अम्बेश"

Sunday, August 14, 2016

माँ ने मुझे इंसान को पढ़ना सिखा दिया !

1

कैसे भी मुश्किलात हों लड़ना सिखा दिया,
ठोकर लगे तो गिर के संभलना सिखा दिया ।
अब मुझको ज़माने के तौर हो गए मालूम,
माँ ने मुझे इंसान को पढ़ना सिखा दिया !
दो वक़्त की रोटी तो थी पहले भी कमाई,
कैसे हो बरक्कत मुझे करना सिखा दिया !

2

तेरे बिन यह शहर कितना अज़ीब लगता है,
चाहने वाला भी मुझको रक़ीब लगता है,
जिनके सर पे है उनकी माँ का साया अब मुझको,
ऐसा हर शख्स बड़ा खुशनसीब लगता है !

Thursday, August 11, 2016

कुछ मुक्तक -

कुछ मुक्तक -

1.
सावन में बादलों के आँसू निकल रहे हैं,
जैसे धरा से मिलने को वो मचल रहे हैं ।
जब से हुई मोहब्बत दोनों का हाल यह है,
तुम भी फिसल रहे हो, हम भी फिसल रहे हैं ।

2.

जो दोस्त अपना हमको कब से बता रहीं थीं,
पैसे भी हमारे वो जम कर उड़ा रहीं थीं ।
पहुँचे जब उनके घर पर इज़हारे इश्क़ करने,
डोली में बैठ कर वो ससुराल जा रहीं थीं !

3
इस दिल में मोहब्बत के कुछ दीप जल न पाये,
तुमने की बेवफाई, और हम संभल न पाये।
दुनिया बदल गई है, मौसम बदल गए हैं,
तुम भी बदल गए हो, पर हम बदल न पाये ।

4

तुमने तो समझा जुगनू, महताब बन गया मैं,
तेरे सभी सवालों का जवाब बन गया मैं ।
तुमने बिना पढ़े ही ठुकरा दिया था जिसको,
अब पढ़ रहा ज़माना वो किताब बन गया मैं !

5

कभी शोला कभी शबनम कभी अंगार लिखेंगे,
कभी आँसू की नदिया और कभी मझधार लिखेंगे !
हम अपनी ज़िन्दगी की दास्ताँ जब भी लिखेंगे तब,
तुम्हारा नाम लिखेंगे, तुम्हारा प्यार लिखेंगे !

Friday, August 5, 2016

बड़ा ही मुश्किल है !

किसी से दिल का लगाना बड़ा ही मुश्किल है
आज कल मिलना मिलाना बड़ा ही मुश्किल है,
दूर जो रहता है वो दौड़ के आ जाएगा,
पास वालों को बुलाना बड़ा ही मुश्किल है !
ग़मों का बोझ इस कदर बढ़ा है चेहरे पर,
आज कल हँसना हँसाना बड़ा ही मुश्किल है !
प्राइवेट नौकरी और उसपे यह महँगाई की मार,
इस तरह घर को चलाना बड़ा ही मुश्किल है !
मंच पर आजकल बस चुटकुले ही चलते हैं,
दिल की कविताएं सुनाना बड़ा ही मुश्किल है !
कहीं भी इतनी मोहब्बत न मिलेगी तुझको,
यह वतन छोड़ के जाना बड़ा ही मुश्किल है !
तालियां ही नहीं पेमेंट भी देना वरना,
फिर से 'अम्बेश' का आना बड़ा ही मुश्किल है !

--------अम्बेश तिवारी "अम्बेश"

Monday, August 1, 2016

एक छंद सैनिकों के नाम -

कब तक बातें होंगी और मुलाक़ातें होंगी,
सैनिकों के शव हम कब तक उठाएंगे !
सुधरा नहीं जो कभी आज कैसे सुधरेगा,
अहिंसा का पाठ उसे कब तक पढ़ाएंगे !
हम भेजें चिट्ठियां वो भेजते आतंकियों को,
ऐसा यह व्यापार हम कब तक चलाएंगे !
पीठ पे लिए हैं घाव एक नहीं बार-बार,
छप्पन इंची सीना उन्हें कब हम दिखाएंगे !

::::अम्बेश तिवारी