Monday, September 26, 2016

मत परखियेगा लिबासों से किसी मेहमान को !

मत परखियेगा लिबासों से किसी मेहमान को,
आप ठुकरा ही न दें शायद कभी भगवान को !
मुश्किलों के दौर में जिस शख्स ने की हो मदद,
भूलियेगा मत कभी उस दोस्त के अहसान को !
नासमझ बनता रहा लफ्जों-नज़र से जो मेरी,
रोज़ ख़त लिखते रहे, हम भी उसी नादान को !
बढ़ गया रुतबा हमारा दौलतो-असबाब से,
बस ग़नीमत है यही भूले नहीं ईमान को !
वो मुकद्दस इश्क़ मेरा दर्द बनकर रह गया,
पास दिल के रख लिया उस कीमती सामान को
सांस में अब भी समाई है उसी की जो महक,
हर जगह पर ढूंढ़ते हैं बस उसी पहचान को !
जी यही करता हमारा छोड़ कर इस महल को,
ख़ोज लायें उस पुराने टूटते दालान को !
इंतिहा ये भी हुई है इश्क़ में "अम्बेश" अब,
मौन रहकर मान लेतें हैं सभी फरमान को !

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अम्बेश तिवारी "अम्बेश"

Friday, September 16, 2016

ज़ुबाँ पे बंदिश नहीं मगर जज़्बात पे पहरेदारी है !

ज़ुबाँ पे बंदिश नहीं मगर, जज़्बात पे पहरेदारी है,
सच कहना और सच लिखना अब बहुत बड़ी फनकारी है ।
राम कहे न ईद मुबारक, अनवर होली न खेले,
मज़हब के ठेकेदारों का फिर से फतवा जारी है ।
अजब सियासत का यह मौसम, कोयल है चुपचाप खड़ी,
क्योंकि गीत सुनाना अब मेंढ़क की जिम्मेदारी है ।
अब भी यूँ खामोश रहे तो, यह बर्बादी निश्चित है,
आज पड़ोसी का घर उजड़ा, कल अपनी भी बारी है ।
अपने घर का सूरज क्यों सारी दुनिया में रोशन है,
बस इतनी सी बात पे हर एक जुगनू का मन भारी है ।

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अम्बेश तिवारी

Friday, September 9, 2016

कारवाँ ज़िन्दगी का यूँ चलता रहा !

एक ग़ज़ल की कोशिश -

कारवाँ ज़िन्दगी का यूँ चलता रहा,
जग गिराता रहा, मैं संभलता रहा ।
उसके बिन उम्र ऐसे कटी बेखबर,
रात ढलती रही, दिन निकलता रहा ।
राह में कितने शोले और अंगार थे,
पाँव जलते रहे पर मैं चलता रहा ।
मैंने जिस पर भरोसा किया बेपनाह,
मुझको हर मोड़ पर वो ही छलता रहा ।
उसने कपड़ों के जैसे ही रिश्ते चुने,
वक़्त के साथ रिश्ते बदलता रहा ।
वो दगा दे के मुझको चला भी गया,
मैं खड़ा देखता हाथ मलता रहा ।
आप रोशन हुए एक शमा की तरह,
मोम बन कर मगर मैं पिघलता रहा ।
जिसकी राहों में मैंने गुज़ारे थे दिन,
मुझसे बचकर वो राहें बदलता रहा ।
है अँधेरा बहुत सब यह कहते रहे,
मैं मगर एक दिया बनके जलता रहा ।

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अम्बेश तिवारी